संविधान की प्रस्तावना की विशेषता

TD Desk

भारतीय संविधान की प्रस्तावना को संविधान की आत्मा कहा जाता है। संविधान की प्रस्तावना की विशेषताएँ इसकी भावना और अर्थ को खोलने की एक कुंजी होती है। प्रस्तावना भारत के संविधान के मौलिक दर्शन को दर्शाती है और संविधान की धाराओं की व्याख्या करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

पंडित ठाकुर भार्गव ने कहा है; प्रस्तावना संविधान का बहुत ही बहुमूल्य भाग है, यह संविधान की आत्मा है, यह संविधान की कुंजी है। यह संविधान निर्माताओं का मन खोलने वाली एक वुंफजी है। यह संविधान में जड़ा हुआ एक हीरा है। यह एक सुंदर गद्यांश वाली कविता है, बल्कि यह अपने आप में सम्पूर्ण है।

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42वें संविधान संशोधन के पश्चात् अब संविधान की प्रस्तावना है;

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हम, भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक, गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों कोः

सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म

और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता

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प्राप्त कराने के लिए,

तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए

दृढ़संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर, 1949 ई० (मिति मार्गशीर्ष शुक्ला सप्तमी संवत् दो हजार छह विक्रमी) को एतदद्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।

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प्रस्तावना की विशेषताएँ


प्रस्तावना से भारतीय राज्य की प्रवृति और उन उद्देश्यों का ज्ञान मिलता है; जो कि भावी सरकारों द्वारा प्राप्त किए जाने हैं। यह जनता की प्रभुसत्ता को प्रकट करती है; और उस तिथि को दर्ज करती है; जिस दिन संविधान को संविधान निर्माण सभा के द्वारा अंतिम रूप में अपनाया गया था; प्रस्तावना की विशेषताएँ का विश्लेषण तीन शीर्षकों के अन्तर्गत किया जा सकता है:-

  • सत्ता का स्त्रोत-लोकप्रिय प्रभुसत्ता
  • राज्य की प्रवृति
  • राज्य के उद्देश्य

सत्ता का स्त्रोत-लोकप्रिय प्रभुसत्ता

सबसे पहले प्रस्तावना स्पष्ट रूप में जनता की प्रभुसत्ता के सिद्वान्त को स्वीकार करती है; अर्थात इन शब्दों से आरम्भ हम भारत के लोग…. शब्दों से होती है जो इस तथ्य की पुष्टि हो जाती है; कि समस्त सत्ता का अंतिम स्त्रोत जनता ही है। सरकार अपनी शक्ति जनता से प्राप्त करती है; संविधान का आधार और प्रभुसत्ता जनता में है; और ये अपनी प्रभुसत्ता जनता से प्राप्त करती है। प्रस्तावना यह भी स्पष्ट करती है; कि सदन के सभी सदस्यों की इच्छा है; कि, इस संविधान की जड़ें, इसकी सत्ता, इसकी प्रभुसत्ता जनता से प्राप्त की जाए।

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डॉ. अंबेडकर के अनुसार इस स्वरूप में भारत के संविधान की प्रस्तावना अमरीकी संविधान की प्रस्तावना और संयुक्त राष्ट्र के चार्टर की प्रस्तावना से मिलती है।

प्रस्तावना का आरम्भ इन शब्दों से होता है; कि हम भारत के लोग और इन से भारत के लोगों की प्रभुसत्ता के गुण का पता लगता है। 15 अगस्त, 1947 को ब्रिटिश प्रभुसत्ता की समाप्ति और भारत के एक प्रभुसत्ता सम्पन्न लोकतन्त्रीय गणराज्य के रूप में उभरने के पश्चात् ऐसी घोषणा आवश्यक हो गयी थी।


राज्य की प्रवृति (प्रस्तावना की विशेषताएँ)

प्रस्तावना एक राज्य (देश) के रूप में भारत की पांच प्रमुख विशेषताओं का वर्णन करती है। यह भारत को एक प्रभुसत्ता सम्पन्न, समाजवादी, धर्म-निरपेक्ष, लोकतन्त्रीय, गणराज्य घोषित करती है।

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  • आरम्भ में प्रस्तावना में समाजवादी और धर्म-निरपेक्ष शब्द शामिल नहीं थे।
  • ये इसमें 42वें संशोधन के द्वारा शामिल किए गए।

इन पांच विशेषताओं में से प्रत्येक को स्पष्ट करना आवश्यक है –

1. भारत एक प्रभुसत्ता-सम्पन्न राज्य है

प्रस्तावना घोषित करती है कि भारत एक प्रभुसत्ता सम्पन्न देश है। स्वतन्त्रता के बाद भारत स्वयं निर्णय करने के लिए और इनको अपने लोगों और क्षेत्रों पर लागू करने के लिए आंतरिक और बाहरी रूप में स्वतन्त्र है। संविधान की प्रस्तावना भारत के प्रभुसत्ता सम्पन्न स्वतन्त्र देश होने की घोषणा करती है। शब्द प्रभुसत्ता का अर्थ आंतरिक और बाहरी प्रभुसत्ता दोनों को प्रकट करता है। इसका अर्थ यह भी है; कि भारत की सरकार आंतरिक और विदेशी मामलों में स्वतन्त्र है; और यह अब किसी भी विदेशी शक्ति के नियंत्रण (अधीन) नहीं है।

2. भारत एक समाजवादी राज्य है

भारतीय संविधान में आरम्भ से ही समाजवाद की भावना पाई जाती थी; पर प्रस्तावना में ‘समाजवाद’ का शब्द शामिल करने के लिए 1976 में संशोधन किया गया। समाजवाद अर्थात भारत सभी प्रकार का शोषण समाप्त करने के लिए आय, स्त्रोतों और सम्पत्ति के न्यायपूर्ण विभाजन की प्राप्ति अपने समस्त लोगों के लिए सामाजिक, सार्वजानिक भलाई आर्थिक और राजनीतिक न्याय प्राप्त करने के लिए वचनबद्व है। परन्तु इस उद्देश्य के लिए वह तानाशाही,मार्क्सवादी/क्रान्तिकारी ढंगों को अपनाने के लिए तैयार नहीं है; यह सिर्फ शान्तिपूर्वक, संवैधानिक और लोकतन्त्रीय ढंगों से द्वारा प्राप्त किया जाना है।

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भारत एक समाजवादी राज्य है’ के शब्द का वास्तविक अर्थ यह है; कि भारत एक लोकतन्त्रीय समाजवादी राज्य है। इससे सामाजिक-आर्थिक न्याय के प्रति वचनबद्वता का पता लगता है; जिसको देश ने लोकतन्त्रीय ढंग के द्वारा प्राप्त किया जाना है।

3. भारत एक धर्म-निरपेक्ष राज्य है

42वें संशोधन के द्वारा ‘धर्म-निरपेक्षता’ को भारतीय राज्य की एक प्रमुख विशेषता के रूप में प्रस्तावना में स्थान दिया गया। इसको शामिल करने से भारतीय संविधान की धर्म-निरपेक्ष प्रवृति को और स्पष्ट किया गया; भारत ने सभी धर्मों को एक समान अधिकार देकर धर्म-निरपेक्षता को अपनाया है। अनुच्छेदों 25 से 28 तक संविधान सभी नागरिकों को धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार देता है। राज्य नागरिकों की धार्मिक स्वतन्त्रता में कोई हस्तक्षेप नहीं करता और संविधान धार्मिक उद्देश्यों के लिए कर लगाने की मनाही करता है।

4. भारत एक लोकतान्त्रिक राज्य है

प्रस्तावना भारत को एक लोकतन्त्रीय देश घोषित करती है; भारत के संविधान में एक लोकतन्त्रीय प्रणाली की व्यवस्था करता है। सरकार की सत्ता लोगों की प्रभुसत्ता पर निर्भर है। सार्वजनिक वयस्क मताधिकार, चुनाव लड़ने का अधिकार, सरकारी पद प्राप्त करने का अधिकार, संगठन स्थापित करने का अधिकार और सरकार की नीतियों की आलोचना और विरोध करने का अधिकार, अपने विचार प्रकट करने और बोलने की स्वतन्त्रता, प्रेस की स्वतन्त्रता और शान्तिपूर्वक सभाएँ करने की स्वतन्त्रता प्रत्येक नागरिक को दी गई है। लोग चुनावों के द्वारा सरकार को परिवर्तित कर सकते हैं। सरकार को सीमित शक्तियाँ प्राप्त हैं; यह संविधान के दायरे में रह कर ही कार्य कर सकती है।

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5. भारत एक गणराज्य है

प्रस्तावना भारत को एक गणराज्य घोषित करती है। भारत का शासन किसी राजा या मनोनीत मुखिया के द्वारा नहीं चलाया जाता। राज्य का अध्यक्ष एक निर्वाचित मुखिया होता है जोकि एक निर्धारित कार्यकाल के लिए अपनी शक्तियों का प्रयोग करता है। गणराज्य अर्थात यह एक ऐसी सरकार होती है; जो अपने अधिकार प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष ढंग से लोगों की महान् संस्था से प्राप्त करती है; और ऐसे लोगों के द्वारा चलाई जाती है; जो लोगों की इच्छा के अनुसार ही अपने पदों पर सीमित समय के लिए या अच्छे व्यवहार तक बने रह सकते हैं; भारत उन शर्तों को पूर्ण करता है और इसलिए यह एक गणराज्य है।

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राज्य के उद्देश्य (प्रस्तावना की विशेषताएँ)

संविधान की प्रस्तावना चार प्रमुख उद्देश्यों का वर्णन करती है; जो कि इसके सभी नागरिकों के लिए प्राप्त किए जाने हैं।

न्याय – भारत का संविधान सभी नागरिकों के लिए सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय के उद्देश्य को स्वीकार करता है। अर्थात किसी भी नागरिक से जाति-पाति, नस्ल, रंग, धर्म, लिंग और जन्म स्थान के आधार पर कोई भी भेदभाव न किया जाए और उन्होने समाज के साथ, आर्थिक और एक ही जैसे राजनीतिक अवसर प्रदान करने की व्यवस्था करना है।

स्वतन्त्रता – प्रस्तावना स्वतन्त्रता को दूसरा मुख्य उद्देश्य घोषित करती है राज्य का कर्त्तव्य है; कि यह लोगों की स्वतन्त्रता को सुरक्षित करे, विचारों को प्रकट करने की स्वतन्त्रता प्रदान करें, धार्मिक विश्वास और पूजा पाठ की स्वतन्त्रता को विश्वसनीय बनाए।

समानता – समानता को प्रस्तावना तीसरा मुख्य उद्देश्य घोषित करती है। कानून की दृष्टि में सभी भारतीय एक समान हैं; और धर्म, नस्ल, लिंग, रंग, जाति-पाति या निवास आदि के भेदभाव के बिना समान अवसरों की उपलब्धि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 समानता का अधिकार प्रदान करते हैं।

भ्रातृभाव – प्रस्तावना स्पष्ट रूप में घोषित करती है; कि लोगों के परस्पर भाईचारे और प्रेम को बढ़ावा देना राज्य का लक्ष्य है; ताकि लोगों में भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक एकता की भावना पैदा हो। इसमें मनुष्य का सम्मान बनाए रखने और राष्ट्र की एकता और अखण्डता स्थापित करने और बनाए रखने का लक्ष्य भी शामिल किया गया है।


संविधान को अपनाने और पारित करने की तिथि

प्रस्तावना के अन्तिम भाग में यह ऐतिहासिक तथ्य दर्ज किया गया है; कि संविधान 26 नवम्बर, 1949 को स्वीकार किया गया। इसी दिन ही संविधान पर संविधान निर्माण सभा के प्रधान ने हस्ताक्षर किए और इसको लागू किया जाना घोषित किया।

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